
हठयोग ग्रंथों में नाड़ी शोधन क्रिया
1. हठयोगप्रदीपिका में नाड़ी शोधन
मूल श्लोक
हठयोगप्रदीपिका (2.5–2.6) में स्पष्ट रूप से नाड़ी-शुद्धि का उल्लेख मिलता है—
चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥
मलाकुलासु नाड़ीषु मारुतो नैव मध्यगः।
कथं स्यादुन्मनीभावः कार्यसिद्धिः कथं भवेत्॥
अर्थ
जब तक नाड़ीयाँ मल (अशुद्धि) से युक्त रहती हैं, तब तक प्राणवायु सुषुम्ना में प्रवाहित नहीं हो सकता।
अतः योग की उच्च अवस्था (उन्मनी अवस्था / समाधि) की सिद्धि के लिए नाड़ियों की शुद्धि अनिवार्य है।
संकेत
यहाँ स्पष्ट है कि—
नाड़ी शोधन प्राणायाम से पूर्व की तैयारी है
इसका उद्देश्य शुद्धि है, न कि प्राण नियंत्रण
2. घेरण्ड संहिता में नाड़ी शोधन (नाड़ी-शुद्धि)
मूल श्लोक
घेरण्ड संहिता (5.34–36) में नाड़ी शुद्धि का स्पष्ट क्रम मिलता है—
शोधनं च द्विधा प्रोक्तं समनुक्रमतः शुभम्।
बीजेन च समानेन नाड़ीशुद्धिर्विधीयते॥
पूरयेच्चन्द्रनाडीया रेचयेच्च पुनः सूर्यया।
पूरयेच्च पुनः सूर्यां रेचयेच्चन्द्रया ततः॥
अर्थ
नाड़ियों की शुद्धि दो प्रकार से कही गई है।
यहाँ वर्णित विधि में—
पहले इड़ा (चंद्र नाड़ी) से पूरक
फिर पिंगला (सूर्य नाड़ी) से रेचक
तत्पश्चात उल्टे क्रम से अभ्यास
करके नाड़ियों की शुद्धि की जाती है।
बिंदु
कहीं भी दीर्घ कुम्भक का अनिवार्य विधान नहीं
न ही बंध या कठिन अनुपातों का उल्लेख
➡️ इसलिए यह शोधन क्रिया है, न कि शुद्ध प्राणायाम।
3. शास्त्रीय निष्कर्ष
हठयोगप्रदीपिका और घेरण्ड संहिता दोनों में—
नाड़ी शोधन को शुद्धि की प्रक्रिया माना गया है
इसे प्राणायाम से पूर्व अभ्यास कहा गया है
प्राणायाम की सिद्धि का आधार बताया गया है
निष्कर्ष
नाड़ी शोधन कोई स्वतंत्र प्राणायाम नहीं,
अपितु क्रिया है।